श्रद्धालुओं को खुले लोकपाल लक्ष्मण मंदिर के कपाट

गोपेश्वर (चमोली)। उच्च हिमालय में स्थित चमोली जिले की भ्यूंडार घाटी में स्थित लोकपाल लक्ष्मण मंदिर के कपाट पारंपरिक रीति रिवाजों और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच शुक्रवार को श्रद्धालुओं के दर्शनों को खोल दिए गए हैं। इस मौके पर तमाम श्रद्धालुओं ने भगवान लक्ष्मण के दर्शनों का पुण्य लाभ अर्जित कर खुशहाली की मनौती मांगी।

विश्व प्रसिद्ध फूलों की घाटी से सटे लोकपाल लक्ष्मण मंदिर के कपाट खुलते ही तमाम श्रद्धालु भगवान के दर्शनों से अभिभूत हो उठे। अब शनिवार को सिखों के प्रमुख धाम हेमकुंड साहिब के कपाट भी दर्शनों को खोल दिए जाएंगे।
उच्च हिमालय में सिखों के प्रमुख धाम हेमकुंड साहिब तथा हिंदुओं के पवित्र तीर्थ लोकपाल लक्ष्मण मंदिर 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं। इन तीर्थों की न सिर्फ अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपराएं हैं, बल्कि यह दो धार्मिक-सांस्कृतिक एकता की मिसाल के रूप में भी विश्वभर में विख्यात हैं।

यह अजब गजब संयोग है कि देवभूमि उत्तराखंड में जहां हिंदुओं के प्रसिद्ध तीर्थ बदरीनाथ और भ्यूंडार घाटी में लोकपाल लक्ष्मण मंदिर विद्यमान हैं वहीं सिखों के प्रसिद्ध धाम के रूप में हेमकुंड साहिब के इस क्षेत्र में ही विद्यमान होने के चलते यहां अनुठी धार्मिक परंपराओं को देखने का अवसर भी लोगों को मिलता है। हिमालय की भ्यूंडार घाटी वैसे भी अद्भूत प्राकृतिक सौंदर्य तथा नैर्सगिकता से परिपूर्ण है। हिंदू-सिख एकता की मिशाल अगर कहीं कायम है तो वह इसी घाटी में है। कहते हैं कि गंदमादन पर्वत पर तीर्थ यात्रा के दौरान जब पांडव बद्रिकाश्रम क्षेत्र में निवास करते थे तब भ्रमण के दौरान द्रोपदी को एक दिन एक ब्रह्मकमल मिला। यह ब्रह्मकमल अत्यंत सुंदर व सुगंधित था। इस पुष्प की सुंदरता ने द्रौपदी का मन मोह लिया तब उन्होंने भीम से ऐसे ही फूल लाने को कहा। महाबली भीम इस क्षेत्र के समस्त रमणीक वनों, सरोवरों, नदियों और जंगलों को देखते हुए देवप्रिय ब्रह्मकमलों वाले क्षेत्र में पहुंच गए। जहां भांति-भांति के कमल खिले थे। वे इस अलौकिक सुंदरता को देख मुग्ध हो गए। काफी समय तक इस क्षेत्र में विचरण के बाद बहुत सारे ब्रह्मकमल लाकर उन्होंने द्रौपदी को भेंट किए। ब्रह्मकमल पाकर द्रौपदी अभिभूत हो उठी। बद्रिकाश्रम क्षेत्र में पांडुकेश्व रनामक स्थान को पांडवों का तत्कालीन निवास मानते हुए उल्लेख किया गया है कि यहां से लगभग इशानकोण पर स्थित हेमकुंड ही वह कुंड है जहां से महाबली भीम द्रौपदी के लिए कमल लाए थे। हेमकुंड क्षेत्र में ब्रह्मकमल बड़ी मात्रा में उपलब्ध रहते हैं।

मान्यता है कि सिखों के दसवें गुरू गोविंद सिंह के हेमकुंड पर्वत पर तपस्या करने के कारण ही यह क्षेत्र हेमकुंड साहिब के रूप में विख्यात हुआ। गुरू गोविंद सिंह ने पूर्व जन्म में इसी हेमकुंड के किनारे योग साधना भी की थी। वर्ष 1936 में सिखों का एक दल हवलदार सोहन सिंह व संत मदन सिंह के नेतृत्व में इस तीर्थ पहुंचा था। तब उन्होंने भ्यूंडार के नंदा सिंह चैहान का साथ दिया था। नंदा सिंह के सहयोग से इस स्थान को ढूंढ लिया गया। तब हेमकुंड साहिब को ही गुरू गोविंद सिंह की तपस्थली के रूप में मान्यता मिली थी। इसके बाद यहां गुरूद्वारे की स्थापना की गई और भ्यूंडार के ही नंदा सिंह को मुख्य ग्रंथी भी बना दिया गया। बाद में नंदा सिंह गुरूग्रंथ की पूजा अर्चना में भी दक्ष बन गए। इसके पश्चात गुरूमुखी के भी वे ज्ञाता बने। करीब 25 वर्षों तक उन्हें ग्रंथी रहने का सौभाग्य मिला। हेमकुंड साहिब-लोकपाल लक्ष्मण मंदिर के कपाट पहले तक एक ही दिन खुलते थे। इस बार एक दिन पूर्व लक्ष्मण मंदिर के कपाट खुल गए हैं तो अगले दिन यानि शनिवार को हेमकुंड साहिब के कपाट खुलते ही सिख श्रद्धालु मत्था टेकेंगे।

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